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रविवार, 10 सितंबर 2017

जिन्दगी

विवसता में  हाथ  कैसे  मल रही  है जिन्दगी
मनुज से ही मनुजता को छल रही है जिन्दगी
एक  छोटे  से  वतन  के  सत्य  में आभाव में
रास्ते की पटरियों  पर  पल  रही  है जिन्दगी//0//

फूल  है  जिन्दगी  शूल  है  जिन्दगी
भटकने पर  कठिन भूल है जिन्दगी
जो समझते है अपने को उनके लिए
मनुजता का  सही मूल  है  जिन्दगी//१//

छाँव  है  जिन्दगी  धूप  है  जिन्दगी
मधुरता  से  भरा  कूप  है  जिन्दगी
सत्य में सत्य  के साधकों  ने  कहा
ईश का ही तो  प्रतिरूप है जिन्दगी//२//

शान  है  जिन्दगी  मान  है   जिन्दगी
अपनेपन  से  भरी  खान  है जिन्दगी
कितना ऊँचा महल हो भले खण्डहर
जब तलक साथ  में जान है जिन्दगी//३//

प्रेम  का  बीज  बोती  कहीं   जिन्दगी
अपना अस्तित्व  खोती कहीं जिन्दगी
सत्य में अपने लौकिक सुखों के लिए
बैलगाड़ी   में   जोती   कहीं  जिन्दगी//४//

आग की नित तपिस भी सहे जिन्दगी
सर्द   में   बन   पसीना   बहे  जिन्दगी
रात हो या दिवस  कितनी मेहनत पड़े
फिर भी आराम को  न  कहे  जिन्दगी//५//

झंझटों  में  उलझ - सी  गयी  जिन्दगी
कैसे  दोजख  सदृश हो गयी  जिन्दगी
आग  से  खेलते   जो  उदर  के  लिए
रोज  मिलती  उन्हें  भी  नयी जिन्दगी//६//

नित्य   बूटे   कसीदे   गढ़े   जिन्दगी
मन में उल्लास  लेकर बढ़े  जिन्दगी
ज्ञान  सम्पूर्ण  हो  यह  जरूरत नहीं
नौकरी  के  लिए  ही  पढ़े   जिन्दगी//७//

कहीं  कर्तव्य  में  फँस गयी जिन्दगी
कैसे  वक्तव्य  में फँस  गयी जिन्दगी
आजकल की  चकाचौंध  में  दीखने
सत्य  में  भव्य में फँस गयी जिन्दगी//८//

पिस रही जिन्दगी घिस रही जिन्दगी
पीव बनकर कहीं  रिस रही जिन्दगी
अपने कर्तव्य  में  कैसी  उलझी  हुई
दीख  जाती  वही जिस रही जिन्दगी//९//

पल रही जिन्दगी  चल रही  जिन्दगी
अर्थ  के  अर्थ  में  छल रही जिन्दगी
बस नमक  और  रोटी के आभाव में
भूख की आग  में  जल रही जिन्दगी//१०//

आज है क्या पता कल नहीं जिन्दगी
जिन्दगी जिन्दगी  मल नहीं जिन्दगी
सीख ले जो भी  जीना किये कर्म से
मौत हो जाये यह हल नहीं  जिन्दगी//११//

जिन्दगी  का मधुर  गीति है जिन्दगी
आदि से  सृष्टि  की रीति है  जिन्दगी
प्रेम  से  जो  जिए  प्रेम  के  ही लिए
उसको  अनुभूति है प्रीति है जिन्दगी//१२//

सुख - दुखों को भी चखती कहीं जिन्दगी
अपनी किस्मत को लखती कहीं जिन्दगी
अन्तरिक्ष    हो   या   माउण्टएवरेस्ट   हो
हौंसला   उच्च     रखती   कहीं  जिन्दगी//१३//

कहीं   सौरभ  विखेरे  यही  जिन्दगी
काम आ जाये जो बस वही जिन्दगी
न हो पीड़ा किसी को  स्वयं से कभी
स्वयं  ही  कष्ट  सारे   सही  जिन्दगी//१४//

धूप  हो  छाँव  हो  काटती  जिन्दगी
कर्ज का बोझ भी  पाटती  जिन्दगी
भूख से जब भी लाचार हो जाती है
जूंठे   दोने   उठा  चाटती   जिन्दगी//१५//

द्वेष-विद्वेष  भी  कर  रही  जिन्दगी
कैसे अपनों ले ही डर रही जिन्दगी
दीखती ही नहीं  अब सहनशीलता
ऐसे परिप्रेक्ष्य में मर  रही  जिन्दगी//१६//

शब्द से ही  मशीहा  बनी  जिन्दगी
दम्भ  में  पूर्णतः  है  सनी  जिन्दगी
एक छोटा - सा उपकार होता नहीं
बन  गयी आज कैसी धनी जिन्दगी//१७//

मात्र  आहार  ही  कथ्य  है जिन्दगी
प्राणवायु   जहाँ   तथ्य  है  जिन्दगी
आज  के  दौर  में  कोई  होता  नहीं
जीना तो है तभी स्वश्थ्य है जिन्दगी//१८//

आँख में चुभ रही  है  कहीं  जिन्दगी
जाने कितनी अकारण जही जिन्दगी
वैमनश्यता  में आयु  चली  जाती  है
प्रेम का पुष्प  खिलता  नहीं जिन्दगी//१९//

राज  अन्तःकरण  में  लिये   जिन्दगी
कितने उपकार हम पर किये जिन्दगी
ज्ञान की ज्योति  उर में प्रकाशित करे
बाकी कुछ भी नहीं जो दिये जिन्दगी//२०//

मोक्ष पद मिल सके त्याग है जिन्दगी
आवरण   से   ढकी  राग है  जिन्दगी
अपना अस्तित्व खोती समर्पण में जो
वही  जीवन  का  अनुराग है जिन्दगी//२१//

भोगियों  के  लिए  भोग  है  जिन्दगी
कर्म से जो विमुख  रोग  है  जिन्दगी
जीव का  ईश  से  सम्मिलन  दे करा
सत्य  का  सार्थक  योग है  जिन्दगी//२२//

धर्म  है  ही  नहीं   पाप   है   जिन्दगी
लोभियों, लोभ का  जाप  है  जिन्दगी
न  क्षमा  है  दया  है  न  करुणा  ही है
उनका जीवन ही अभिशाप है जिन्दगी//२३//

साधना  के  लिए   पूर्ति   है   जिन्दगी
उर  में  आनन्द  दे  मूर्ति  है   जिन्दगी
अपने पथ से नहीं  जो विमुख हो रहा
कितने संकट  हो  स्फूर्ति  है  जिन्दगी//२४//
https://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2017/09/muktak.html

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

जागरण गीत

भोर  भई  रवि  की  किरणें  धरती  कर  आय  गईं  शरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा  कन-सा  अब  देर  नहीं  करना//
गान  करैं  चटका  चहुँओर   सुकाल  भई  सब  धावति  हैं
नीड़न  मा बचवा बचिगै  जिन मां  कर  याद  सतावति  हैं
फूलन  की  कलियॉ  निज  कोष  पसारि सुगंध लुटावति हैं
मानव हों अलि हों  सबको  निज  रूपन  मा  भरमावति हैं//
देख  सुकाल  सुमंगल  है   इनको   निज  नैनन  में  भरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा  कन-सा  अब  देर  नहीं  करना//
खेतन और बगीचन  पै  रजनी  निज  ऑसु  बहाय  गई  है
पोछन को रवि की किरणें द्युति साथ  धरातल  झीन नई है
पोशक दोष विनाशक जो अति कोमल-सी अनुभूति भई है
सागर में सुख के उठि के अब चातक मोतिन खोजि लई है//
दॉत  गिनै  मुख  खोलि  हरी  कर  भारत  भूमि नहीं डरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा  कन-सा  अब  देर  नहीं  करना//
खेतन  मा  मजदूर  किसान  सभी  निज काज सँवार रहे हैं
गाय बँधी बछवा बछिया  निज  भोजन  हेतु  जुहार  रहे  हैं
प्राण-अपान-समान-उदान तथा  नित  व्यान  पुकार  रहे  हैं
जीवन  की गति  है जहँ  लौ  सब  ईश्वर  के उपकार रहे हैं//
आय  सुहावन  पावन  काल   इसे  निज  अंकन  में  भरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा  कन-सा  अब  देर  नहीं   करना//
रैन गई चकवा  चकवी  विलगान  रहे  अब  आय  मिले  हैं
ताप मिटा मन कै सगरौ  तन  से  मन से पुनि जाय खिले हैं
बॉध रहे  अनुराग, विराग  सभी  उर  से  विसराय  किले  हैं
साधक  योग करैं  उठि  कै  तप  से निज हेतु बनाय विले है//
प्राण  सजीवनि  वायु  चली  अब  तौ   सगरौ दुख कै हरना
लाल  सवेर  भई  उठ   जा  कन-सा  अब  देर  नहीं  करना//
यह है जल लो मुख धो  करके अभिनंदन सूरज का कर लो
मिटता मन का सब  ताप उसे  तुम भी अपने उर में भर लो
बल-आयु बढ़े यश भी  बढ़ता  नित ज्ञान मिलै उर में धर लो
अपमान मिले सनमान मिले  सुख की अनुभूति करो उर लो//
जाय  पढ़ो  गुरु  से  तुम   पाठ   प्रणाम  करो  उनके  चरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा   कन-सा   अब  देर  नहीं  करना//
https://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2017/08/blog-post_31.html

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

अवधी गीत

मित्रों एक लोक गीत समर्पित है=>

पिया आये तौ घरवा दुवार अजब महकै लागा।
सुनी कोयल कै मीठी पुकार जिया चहकै लागा॥
अखिया से अखिया मिली उनसे जैसे,
सोचि न पाई बाति करी वनसे कैसे,
मिटा मनवा कै हमरे गुबार,जिया लहकै लागा।
पिया आये""""॥
तोहरी सुरति पिया कब से बसायन,
तोहरे दरश कहैं जिनगी गवायन,
बहि अँखियन से अँसुवन की धार,
पिया बहकै लागा।
पिया आये""""॥
जिनगी सुफल भई तोहरा के पायन,
प्रेम कै गीति आजु मनवा से गायन,
उठै बार-बार मन मा मल्हार,
जिया कहुँकै लागा।
पिया आये""""॥
https://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2017/08/blog-post.html

सोमवार, 28 अगस्त 2017

        मुक्तक--------
प्रेम  उल्लास  मन  के  सभी ढह  गये
स्वार्थ ही स्वार्थ में सबके सब बह गये
नेह अन्तस  में  दोनों के  पलता  नहीं
आज  सम्बन्ध-सम्बन्ध  नन  रह गये//
https://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2017/08/blog-post.html
           मुक्तक--__
गुरु बिना तत्व का भान होता नहीं
तत्व से जो विमुख मान होता नहीं
अपने मन की भुनाता भले ही रहे
शोध बिन सत्य का ज्ञान होता नहीं//
https://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2017/08/blog-post.htm
            मुक्तक--------

प्रेम होता है  अनुबन्ध  होता  नही
देह का कोई  सम्बन्ध  होता  नही
होती जायें अगर कितनी भी दूरियाँ
अन्तरंग का मिलन बन्ध होता नही//

https://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2017/08/blog-post.html

बुधवार, 10 सितंबर 2014

मित्रों सादर प्रणाम 
एक गीत युगल किशोर  के चरणों में 
अनुरञ्जित करते युगल रूप 
नटवर तव चरणों में प्रणाम।   
दो भाव मुझे तव द्वार खड़ा 
दो छन्द मुझे तव द्वार पड़ा 
दो  गीत नई कविता मुझको 
दो किरण नई सविता मुझको 
शाश्वत जग के हो आप भूप 
नटवर तव चरणों में प्रणाम। 
तुम सृजन बीज ही नित बोते 
कण-कण में अाभाषित होते 
मुझको दे दो बस काव्य सृजन 
निश्छल दे दो प्रभु अन्तर्मन । 
वर्णित हो नित तेरा स्वरूप 
नटवर तव चरणों में प्रणाम । 
उपकार कर सकूँ अब सबका 
आभाषित हो दुःख सब सबका 
जिसमें जग का सर्वस्व निहित 
जन मानस का कल्याण विहित। 
मिल जाये मन अनुरूप धूप 
नटवर तव चरणों में प्रणाम । 
द्वेष नहीं अब दिखे कहीं 
मन रुके निरन्तर प्रेम वहीं 
अब ज्ञान पुञ्ज बरसावो ना 
फिर नव उपदेश सुनाओ ना । 
सबको दो अपना दिव्या रूप 
नटवर तव चरणों में प्रणाम । 
बस यही आप से अभिलाषा 
पूरन कर दो मन की आशा 
तुम ही तो जग के स्वामी हो 
मेरा स्वरूप निष्कामी हो  । 
दे दो मुझको अपना स्वरूप 
नटवर तव चरणों में प्रणाम ।
http://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2014/09/blog-post_65.html