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बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

जिन्दगी--मुक्तक

जीतकर  हार  जाना भी  है  जिन्दगी
प्यार अनुरूप  पाना  भी है   जिन्दगी
दौर  कठिनाइयों  का  भले  आ   पड़े
हर्ष  पूर्वक  निभाना  भी  है  जिन्दगी//५१//

मातृ-छाया  से  होती  प्रकट  जिन्दगी
पितृ  संयोग  से   ही  निकट  जिन्दगी
वेद  भी  कह  रहा   माँ - पिता  देवता
मानते   बीत  जाती   विकट  जिन्दगी//५२//

पूर्वजों   के   लिए   बेंट   है   जिन्दगी
जो   समर्पित   रहे   भेंट   है  जिन्दगी
जिनकी  सन्तान   पूरा   मनोरथ  करे
बस  उन्हीं  के  लिए  मेट  है  जिन्दगी//५३//

पित्र  है   और   दौहित्र   है   जिन्दगी
मोह  लेता  स्वयं   चित्र   है   जिन्दगी
अपने  अनुगंध  से जो सुवासित  करे
मधुरता  घोल  दे   इत्र    है   जिन्दगी//५४//

प्रेम  हो  तो कठिन पथ चुने जिन्दगी
अन्यथा  कार्य  में  फिर गुने जिन्दगी
योग संयोग का कुछ भी कहना नहीं
बस विरह की सुमिरनी धुने जिन्दगी//५५//


अनवरत कर  रही  है पहल जिन्दगी
प्रेयशी की सुरति  में  महल जिन्दगी
ध्यान  पल  के  लिए भंग होता नहीं
बन्द पुस्तक-सी रखी रहल  जिन्दगी//५६//

मनुजता   ही  सही  अस्त्र है जिन्दगी
जो   समेटे   स्वयं   वस्त्र  है  जिन्दगी
भौंह की धनुष पर पलक की बाण से
बेध  दे   जो   वही   शस्त्र है जिन्दगी//५७//

प्रेम    परिपूर्ण   पूजा   है    जिन्दगी
प्रवेश  होता नहीं  दूजा   है  जिन्दगी
अपनी  सौरभ  छटा  घोलती  सर्वदा
पुष्प - प्रस्फुरित   चूजा   है  जिन्दगी//५८//

प्रकृति  का  मूल उपहार  है जिन्दगी
जीव की ही तो अधिकार है जिन्दगी
दोष वा दोष के  कारणों को  सकल
कर  दे निर्मूल  प्रतिकार  है जिन्दगी//५९//

प्रेम  ही  तो  मधुर  मंत्र  है   जिन्दगी
सभ्य वैशिष्ट्य  का  तंत्र  है  जिन्दगी
ज्ञान -अज्ञान नित प्रति प्रकट हो रहा
रचयिता  का अतुल  यंत्र  है जिन्दगी//६०//

भूलकर याद आना  भी  है  जिन्दगी
याद आकर भुलाना भी  है  जिन्दगी
उर के डोले में बैठा  उसे  प्रेम  में  से
पेंग भरकर झुलाना  भी  है जिन्दगी//६१//

सुन रही कितनी बकवास है जिन्दगी
हो  गयी  जैसे  उपहास   है  जिन्दगी
मुस्कुरा दे  कोई  एक  क्षण  के  लिए
कर  रही  हास  परिहास  है  जिन्दगी//६२//

गीदड़ों  की  तरह   है  हुआं  जिन्दगी
विष विभूषित हुई  है  धुआं  जिन्दगी
गिर  पड़ेगी   स्वयं   बोध  होता  नहीं
खोदती  दूसरों   को   कुआं  जिन्दगी//६३//

चित लगा खेलती  है  जुआ  जिन्दगी
दाँव पर सब लगा उड़ भुआ  जिन्दगी
फिरती निर्लज्ज बन हाट में इस तरह
आज तक जैसे कुछ न हुआ जिन्दगी//६४//

कष्ट  देती  किसी  की  कमी  जिन्दगी
नेत्र   में   अश्रुओं   से   नमी  जिन्दगी
वेदना  में,  विरह  की  तपिस  में  कहीं
सूखकर   होती   जैसे   ममी  जिन्दगी//६५//

शोक - संताप  में  ही  चुकी  जिन्दगी
एक चिर आश  में  ही  रुकी जिन्दगी
अपनेपन की मधुर माधुरी  में  उलझ
आत्मगौरव विसर कर झुकी जिन्दगी//६६//

मोह  के  फाँस  में  फाँसती  जिन्दगी
पग  नहीं  उठ  रहे  हाँफती  जिन्दगी
पास आये  बुढ़ापा  सिथिल  इन्द्रियाँ
अस्थमा  रोग   से  खाँसती  जिन्दगी//६७//

आज काँटों भरी  डग  बनी  जिन्दगी
बस निजी स्वार्थ में ठग बनी जिन्दगी
चन्द दौलत ही  आयी  बटुए  में  क्या
नभ में उड़ता हुआ खग बनी जिन्दगी//६८//

गिरती उठती फिसलती कहीं जिन्दगी
तेल  में  भी  उबलती   कहीं  जिन्दगी
पाँव   में   ठोकरों   के  लगे  ही  बिना
क्या सही में  सँभलती  कहीं  जिन्दगी६९//

काट   लेती   फटे   हाल  में  जिन्दगी
सुख वशा हो कहीं  पाल  में  जिन्दगी
नित्य उन्नति कहूँ कि  क्षरण  हो  रहा
जा  रही  काल  के  गाल  में  जिन्दगी//७०//

वश गयी  है  कहीं  लाल   में   जिन्दगी
दीखती   अश्व   के  नाल   में   जिन्दगी
मुक्ति के अनवरत अनगिनत कर जतन
फँस   गयी  कैसे   जंजाल  में  जिन्दगी//७१//

बोलने   के   लिए   मंच   है   जिन्दगी
देखने   पर   दिखे   टंच   है   जिन्दगी
हाल अपने को अपनी समझ आती है
सुन्यवस्थित    नहीं   रंच   है  जिन्दगी//७२//

मृत्यु  के  रूप  में  फिर  रही  जिन्दगी
नीचता   हद  नहीं  गिर  रही  जिन्दगी
प्रश्न  वाचक  प्रतीकों  से  परिपूर्ण  हो
गोलियों  से  स्वयं  घिर  रही  जिन्दगी//७३//

कैसे   सम्मान   में   फूलती   जिन्दगी
हर्ष   अतिरेक   में   झूलती   जिन्दगी
यदि समा  जाय  उर  में  अहं  भावना
अपना कर्तब्य  तक  भूलती  जिन्दगी//७४//

लिख रही जिन्दगी, जिन्दगी, जिन्दगी
शिर झुका कर  रही  बन्दगी  जिन्दगी
मेरा  वातावरण  स्वच्छ  हो  जाय  तो
नाम मिट जाय  यह  गन्दगी  जिन्दगी//७५//

गीत   है  साज   श्रृंगार   है   जिन्दगी
मोतियों  से  गुँथा   हार   है   जिन्दगी
पद की गरिमा अपनी समझ जाय जो
तार  वीणा  का   झन्कार  है  जिन्दगी//७६//

देश   की   कर   ही   सुरक्षा  जिन्दगी
दे  रही  नित्य  प्रति   परीक्षा  जिन्दगी
हाथ  पर  हाथ  रख  सो  रहे  चैन  से
अपनी  करती   नहीं   रक्षा   जिन्दगी//७७//

वायु  के  वेग - सी  डोलती   जिन्दगी
राज  अन्तःकरण  खोलती   जिन्दगी
काट  देती  कहीं  कतरनी  की   तरह
मधुभरा   प्रेम  रस  घोलती  जिन्दगी//७८//

साधना  के  लिए  युक्ति   है  जिन्दगी
भोग  को  त्याग  दे  मुक्ति  है जिन्दगी
कोई रच  ले  भले  स्वर्ग  की  सीढ़ियाँ
है   भरोसा   नहीं  उक्ति  है    जिन्दगी//७९//

अनिश्चितता   भरा   खेल  है  जिन्दगी
दो  दिलों  का  मधुर  मेल  है  जिन्दगी
सत्य  विश्वास   के   भरोसे  पर  टिका
औषधी  से   बना   तेल   है   जिन्दगी//८०//

निज किये  की  सजा पा रही जिन्दगी
जेल  में   रोटियाँ   खा   रही  जिन्दगी
चोरी   हिंसा   अनाचार   न   छोड़कर
सुरक्षा    पैंतरे    ला    रही    जिन्दगी//८१//

कर लिया दुर्दिनों  का  चयन  जिन्दगी
नींद आती  नहीं  अब  नयन  जिन्दगी
जब ग्रसित तीन  तापों  से हो जाय तो
कोशिशों  से  न  पाये  शयन  जिन्दगी//८२//

तपस्या  में  कठिन  तप  रही  जिन्दगी
नित्यप्रति शोध  में  खप  रही  जिन्दगी
श्वाँस से  नाम  का  नित्य अभ्यास कर
इष्ट  की  प्राप्ति  हो  जप  रही जिन्दगी//८३//

कहीं पर  साज  सज्जा  बनी  जिन्दगी
दीखती   लोक  लज्जा  बनी  जिन्दगी
अस्थियों   में   वशा  माँस  मेदा   भरी
चल रही  रक्त   मज्जा   बनी  जिन्दगी//८४//

प्रेम    है   और   सद्भाव   है   जिन्दगी
एक  दूजे  का   आभाव   है   जिन्दगी
तत्व  का  ज्ञान  परिपूर्ण  हो  जाय  तो
ईश  वा  जीव  समभाव   है   जिन्दगी//८५//

लौह से लौह  नित  थढ़  रही  जिन्दगी
कैसी - कैसी कला  गढ़  रही  जिन्दगी
अपनी संभाव्य इच्छा सकल  पूर्ण  हो
खोज  करती  नई   बढ़  रही  जिन्दगी//८६//

शातिरों  की  तरह  कढ़  रही  जिन्दगी
अनवरत  बेल  सी  बढ़   रही  जिन्दगी
दोष   अपना   नहीं   आज  स्वीकारती
दूसरे   पर   सभी   मढ़   रही  जिन्दगी//८७//

भव्यता   दे   रही   गोट   है    जिन्दगी
द्वेष  उर  में   वशा   खोट  है   जिन्दगी
मुझको   लगता   नहीं   दूसरा  दे  रहा
पाती  अपनों से  ही  चोट  है  जिन्दगी//८८//

अनुकरण  के  लिए  नोट  है  जिन्दगी
दिव्यता  से  भरी   कोट   है   जिन्दगी
पाने से  ही  मधुरता  का  आभास  हो
पौष्टिकता   भरी    रोट    है   जिन्दगी//८९//

मोहती  उर  की  अनुरक्ति  है  जिन्दगी
नवयुवा   में   भरी   शक्ति  है  जिन्दगी
हर जगह आजकल विष वपन कर रही
क्या यही सत्य अभिव्यक्ति है  जिन्दगी//९०//

बर्फ  की  पर्त  में  दब   गयी   जिन्दगी
जैसे - गतिरोध पर थम  गयी  जिन्दगी
आजतक  द्वेष - विद्वेष   में  ही  उलझ
ऐसा लगता  नहीं  कम  गयी  जिन्दगी//९१//

मधु   बनी   है   कहीं   तीखा  जिन्दगी
अपना   होता   नहीं   चीखा   जिन्दगी
सम्बन्ध   के    जाँत    में    पिस   रही
इस  तरह   से   बहुत   दीखा  जिन्दगी//९२//

हो   रही   कलंकित   टीका    जिन्दगी
अपने   सनमान   को  फीका  जिन्दगी
रोग  से   ग्रस्त   है   मृत्यु   होती   नहीं
लटकती   मध्य   में    छींका   जिन्दगी//९३//

आग की लपट - सी भड़कती  जिन्दगी
बनके बिजली-सी ही कड़कती जिन्दगी
दीख  जाती  लगन  से  लगी   कार्य   में
होके   स्फूर्तिमय    धड़कती    जिन्दगी//९४//

टूट   जाती  वही   न    झुकी   जिन्दगी
सफलता  हाथ में   न    रुकी   जिन्दगी
मनुजता  के  लिए  मनुज  ने  आजतक
कितनी  कीमत अदा कर चुकी जिन्दगी//९५//

लग    रही    है    साख    पर   जिन्दगी
पल्लवित   हो   रही  राख  पर  जिन्दगी
मन  में  विश्वास  की  आस  जगती नहीं
जैसे - रखी   हुई   ताख    पर   जिन्दगी//९६//

घुड़सवारों   की    है    काठी    जिन्दगी
वृद्ध    के    हाथ   की   लाठी   जिन्दगी
खुश   रहे   दूसरों   को   खुशी   दे  सके
बाँधती     रैन -- दिन    गाँठी    जिन्दगी//९७//

खेती   करता   है   जो   माटी   जिन्दगी
नित    पसीना    बहा   काटी    जिन्दगी
फिर   भी  दो  जून   की   रोटी  न  मिले
सो   रही    है   पकड़    पाटी   जिन्दगी//९८//

कितनी   सौन्दर्य - सी   घाटी   जिन्दगी
खिलाती      पेटभर    बाटी     जिन्दगी
स्वर्ण निर्मित  है  जो  मोतियों  से  जड़ी
लगती   प्रतिरूप -- सी  साटी  जिन्दगी//९९//

मोरनी   की   मधुर   चाल   है  जिन्दगी
लटकती  रस  भरी   डाल   है  जिन्दगी
बज  रही पंच  सुर  की  मृदुल साज पर
गीत   का   बोल   है  ताल  है  जिन्दगी//१००//

फाँस   लेती   स्वयं   जाल  है  जिन्दगी
गलने   देती    नहीं    दाल  है  जिन्दगी
उर  में  सन्देह  बनकर  समा  जाय  तो
निकलती   बाल   की खाल है जिन्दगी//१०१//

युग्म का  ही  तो  परिणाम  है  जिन्दगी
कर   रही   नाम,   बदनाम  है  जिन्दगी
जिसने  भी  एक  पग इष्ट के प्रति रखा
बस समझ  लो  वही  दाम  है  जिन्दगी//१०२//

बिना  गतिरोध  के  फिसरती  जिन्दगी
ठण्ड़  परिवेश   में  सिसरती   जिन्दगी
आधुनिकता  की   ऐसी  चकाचौंध  में
संस्कारों   को   भी  विसरती  जिन्दगी//१०३//

खोजती  है  कदाचित्  पवन  जिन्दगी
कर रही  है सुखों  का  हवन  जिन्दगी
वह   भले   ही   स्वयं    झुग्गियों   रहे
फिर भी निर्माण करती भवन जिन्दगी//१०४//

फिर रही  है  कहीं  मन्द  मति  जिन्दगी
चल रही रुक  रही  जैसे-यति   जिन्दगी
दूसरे   को   गिरा   देने   की   चाल   में
करती निज कार्य का पूर्ण क्षय जिन्दगी//१०५//

शर्म  से  झुक  रही  जैसे - रति जिन्दगी
भर  रही  पूर्ण   यौवन से  गति जिन्दगी
पुष्प   बनकर  वही  कोमल - सी  कली
खोजती फिर रही  आज  पति  जिन्दगी//१०६//

उत्सवों   की   लड़ी  रोज    है   जिन्दगी
मृत्यु  पर  कर   रह  भोज   है   जिन्दगी
जितना सुलझाओ उतना उलझ जाती है
रहस्यों   से   भरी   खोज    है   जिन्दगी//१०७//

भाव   की   भंगिमा    बोलती   जिन्दगी
नित  खरा   स्वर्ण  ही तोलती   जिन्दगी
मोह ले  जो  हृदय  अपने  दर्शन  से  ही
एेसी   नक्कासियाँ    रोलती    जिन्दगी//१०८//
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सोमवार, 25 सितंबर 2017

जिन्दगी

विवसता में  हाथ  कैसे  मल रही  है जिन्दगी
मनुज से ही मनुजता को छल रही है जिन्दगी
एक  छोटे  से  वतन  के  सत्य  में आभाव में
रास्ते की पटरियों  पर  पल  रही  है जिन्दगी//0//

फूल  है  जिन्दगी  शूल  है  जिन्दगी
भटकने पर  कठिन भूल है जिन्दगी
जो समझते है अपने को उनके लिए
मनुजता का  सही मूल  है  जिन्दगी//१//

छाँव  है  जिन्दगी  धूप  है  जिन्दगी
मधुरता  से  भरा  कूप  है  जिन्दगी
सत्य में सत्य  के साधकों  ने  कहा
ईश का ही तो  प्रतिरूप है जिन्दगी//२//

शान  है  जिन्दगी  मान  है   जिन्दगी
अपनेपन  से  भरी  खान  है जिन्दगी
कितना ऊँचा महल हो भले खण्डहर
जब तलक साथ  में जान है जिन्दगी//३//

प्रेम  का  बीज  बोती  कहीं   जिन्दगी
अपना अस्तित्व  खोती कहीं जिन्दगी
सत्य में अपने लौकिक सुखों के लिए
बैलगाड़ी   में   जोती   कहीं  जिन्दगी//४//

आग की नित तपिस भी सहे जिन्दगी
सर्द   में   बन   पसीना   बहे  जिन्दगी
रात हो या दिवस  कितनी मेहनत पड़े
फिर भी आराम को  न  कहे  जिन्दगी//५//

झंझटों  में  उलझ - सी  गयी  जिन्दगी
कैसे  दोजख  सदृश हो गयी  जिन्दगी
आग  से  खेलते   जो  उदर  के  लिए
रोज  मिलती  उन्हें  भी  नयी जिन्दगी//६//

नित्य   बूटे   कसीदे   गढ़े   जिन्दगी
मन में उल्लास  लेकर बढ़े  जिन्दगी
ज्ञान  सम्पूर्ण  हो  यह  जरूरत नहीं
नौकरी  के  लिए  ही  पढ़े   जिन्दगी//७//

कहीं  कर्तव्य  में  फँस गयी जिन्दगी
कैसे  वक्तव्य  में फँस  गयी जिन्दगी
आजकल की  चकाचौंध  में  दीखने
सत्य  में  भव्य में फँस गयी जिन्दगी//८//

पिस रही जिन्दगी घिस रही जिन्दगी
पीव बनकर कहीं  रिस रही जिन्दगी
अपने कर्तव्य  में  कैसी  उलझी  हुई
दीख  जाती  वही जिस रही जिन्दगी//९//

पल रही जिन्दगी  चल रही  जिन्दगी
अर्थ  के  अर्थ  में  छल रही जिन्दगी
बस नमक  और  रोटी के आभाव में
भूख की आग  में  जल रही जिन्दगी//१०//

आज है क्या पता कल नहीं जिन्दगी
जिन्दगी जिन्दगी  मल नहीं जिन्दगी
सीख ले जो भी  जीना किये कर्म से
मौत हो जाये यह हल नहीं  जिन्दगी//११//

जिन्दगी  का मधुर  गीति है जिन्दगी
आदि से  सृष्टि  की रीति है  जिन्दगी
प्रेम  से  जो  जिए  प्रेम  के  ही लिए
उसको  अनुभूति है प्रीति है जिन्दगी//१२//

सुख - दुखों को भी चखती कहीं जिन्दगी
अपनी किस्मत को लखती कहीं जिन्दगी
अन्तरिक्ष    हो   या   माउण्टएवरेस्ट   हो
हौंसला   उच्च     रखती   कहीं  जिन्दगी//१३//

कहीं   सौरभ  विखेरे  यही  जिन्दगी
काम आ जाये जो बस वही जिन्दगी
न हो पीड़ा किसी को  स्वयं से कभी
स्वयं  ही  कष्ट  सारे   सही  जिन्दगी//१४//

धूप  हो  छाँव  हो  काटती  जिन्दगी
कर्ज का बोझ भी  पाटती  जिन्दगी
भूख से जब भी लाचार हो जाती है
जूंठे   दोने   उठा  चाटती   जिन्दगी//१५//

द्वेष-विद्वेष  भी  कर  रही  जिन्दगी
कैसे अपनों ले ही डर रही जिन्दगी
दीखती ही नहीं  अब सहनशीलता
ऐसे परिप्रेक्ष्य में मर  रही  जिन्दगी//१६//

शब्द से ही  मशीहा  बनी  जिन्दगी
दम्भ  में  पूर्णतः  है  सनी  जिन्दगी
एक छोटा - सा उपकार होता नहीं
बन  गयी आज कैसी धनी जिन्दगी//१७//

मात्र  आहार  ही  कथ्य  है जिन्दगी
प्राणवायु   जहाँ   तथ्य  है  जिन्दगी
आज  के  दौर  में  कोई  होता  नहीं
जीना तो है तभी स्वश्थ्य है जिन्दगी//१८//

आँख में चुभ रही  है  कहीं  जिन्दगी
जाने कितनी अकारण जही जिन्दगी
वैमनश्यता  में आयु  चली  जाती  है
प्रेम का पुष्प  खिलता  नहीं जिन्दगी//१९//

राज  अन्तःकरण  में  लिये   जिन्दगी
कितने उपकार हम पर किये जिन्दगी
ज्ञान की ज्योति  उर में प्रकाशित करे
बाकी कुछ भी नहीं जो दिये जिन्दगी//२०//

मोक्ष पद मिल सके त्याग है जिन्दगी
आवरण   से   ढकी  राग है  जिन्दगी
अपना अस्तित्व खोती समर्पण में जो
वही  जीवन  का  अनुराग है जिन्दगी//२१//

भोगियों  के  लिए  भोग  है  जिन्दगी
कर्म से जो विमुख  रोग  है  जिन्दगी
जीव का  ईश  से  सम्मिलन  दे करा
सत्य  का  सार्थक  योग है  जिन्दगी//२२//

धर्म  है  ही  नहीं   पाप   है   जिन्दगी
लोभियों, लोभ का  जाप  है  जिन्दगी
न  क्षमा  है  दया  है  न  करुणा  ही है
उनका जीवन ही अभिशाप है जिन्दगी//२३//

साधना  के  लिए   पूर्ति   है   जिन्दगी
उर  में  आनन्द  दे  मूर्ति  है   जिन्दगी
अपने पथ से नहीं  जो विमुख हो रहा
कितने संकट  हो  स्फूर्ति  है  जिन्दगी//२४//

तड़पती है  कहीं  बन  विरह जिन्दगी
कर रही  है कहीं  पर  जिरह जिन्दगी
झंझटों से ग्रसित बनके अयहाय - सी
चल रही  है  कहीं  दर गिरह जिन्दगी//२५//

रम में  विक्षिप्त - जैसी  रमी जिन्दगी
भीड़ है  हर  जगह पर जमी जिन्दगी
दीख  जाती  कहीं  खिलखिलाते हुए
ड़बड़बाई  हैं  पलकें  नमी   जिन्दगी//२६//

सुर्ख  जोड़े  में  जाती  कहीं जिन्दगी
काल  स्वर्णिम बनाती  कहीं जिन्दगी
प्रेम  में  अपना   सर्वस्व  देकर  स्वयं
डूबकर  गम  भुलाती  कहीं जिन्दगी//२७//

ले  हथौड़ी  शिला  तोड़ती  जिन्दगी
धार नदियों की भी मोड़ती  जिन्दगी
चन्द लौकिक सुखों के लिए ही सही
पाई - पाई   जुटा   जोड़ती  जिन्दगी//२८//

पग बिना किस तरह घीसती जिन्दगी
अस्पतालों  में  भी  टीसती   जिन्दगी
अपने वश का  कोई  कार्य होता नहीं
क्या  करे  दाँत  ही  पीसती  जिन्दगी//२९//

छूत  है   जिन्दगी   पूत   है   जिन्दगी
है  भविष्य   कहीं   भूत  है   जिन्दगी
रंक,  राजा  बनी  फिरती  इतरती  है
आदि से अन्त तक  सूत  है  जिन्दगी//३०//

बन  रही  जिन्दगी  ठन रही  जिन्दगी
जिन्दगी  के  लिए  धन रही  जिन्दगी
शोक संतप्त  हो  शव  लिए  साथ  में
गाड़ने   हेतु   में    खन  रही जिन्दगी//३१//

कट  रही  जिन्दगी पट  रही जिन्दगी
वेहया   अनवरत   खट रही जिन्दगी
लोभ लालच  तथा मोह से  आवरित
नित्य प्रतिपल सुघर घट रही जिन्दगी//३२//

लथ रही जिन्दगी  पथ  रही  जिन्दगी
कैसे  सम्बन्ध  में  नथ  रही  जिन्दगी
अपना बन जाये  दूजा  गिरे  भड़  में
बस  इसी  भाव  से मथ रही जिन्दगी//३३//

जैसा  ऐनक  हो  वैसा दिखे जिन्दगी
नित्य  वातावरण  से   सिखे जिन्दगी
जो भी कर लेते है  सत्य  की साधना
दूध  का  दूध  पानी   लिखे  जिन्दगी//३४//

ज्ञान  है  और   विज्ञान   है   जिन्दगी
लक्ष्य  भेदे  कठिन  बान  है  जिन्दगी
अपने सम्मोह से  मोहती  जो  जगत
बाँसुरी  की  मधुर   गान  है  जिन्दगी//३५//

स्मरण  हो  रही   विस्मरण  जिन्दगी
हो  रही  नित्यप्रति  संक्षरण जिन्दगी
दृश्य को देखते दिन निकल जाता है
ओढ़ती  मृत्यु  का आवरण  जिन्दगी//३६//

द्वन्द  है  तो  कहीं   फन्द   है  जिन्दगी
कैदखानों    में   भी   बन्द  है  जिन्दगी
जिसको आये कला जीवन जी लेने की
बस  उसी  के  लिए  छन्द  है  जिन्दगी//३७//

बीत  जाये  व्यथा   में  कथा  जिन्दगी
कट न  पाये  कभी  अन्यथा  जिन्दगी
मिल  गयी  है  सुधा पान कर लेने को
तत्व का ज्ञान,  जिसने  मथा  जिन्दगी//३८//

झेलती    जिन्दगी   ठेलती   जिन्दगी
मन  मधुप  माधुरी  मेलती   जिन्दगी
भाव,  आभाव  का  जब सरोकार हो
किस  तरह  रोटियाँ  बेलती  जिन्दगी//३९//

सृष्टि कारण  सृजक  अंश है जिन्दगी
तप से  शोधित  हुआ वंश है जिन्दगी
चेतना   रूप   में   संचरित   हो   रहा
दृश्य  होता   नहीं   हंस   है  जिन्दगी//४०//

स्वाद  का  स्वाद  है  दन्त  है जिन्दगी
प्रीति  सम्बन्ध  में  कन्त   है  जिन्दगी
जो  स्वयं  सिद्ध  आनन्द  के  रूप  में
आदि  से  सम्मिलन  अन्त है जिन्दगी//४१//

स्वप्न  कितने  संजोकर  रखे  जिन्दगी
अनगिनत  घाव  उर पर चखे जिन्दगी
वैसे   संयोग   में  जी    सभी  लेते  हैं
गम नहीं तो क्या जीना सखे! जिन्दगी//४२//

मानता  कोई  समझौता  है  जिन्दगी
मृत्यु उपलक्ष्य में  न्यौता  है  जिन्दगी
भेद  देती  मधुर  जग के सम्बन्ध को
शब्दभेदी      सरौता  है       जिन्दगी//४३//

अन्ततल  में  वशा  देती  भय जिन्दगी
उड़   रही  यान  में  बैठ  गय  जिन्दगी
भोग अतिशय चरम पर पहुँच जाये तो
संवरण  कर  रही  रोग  क्षय   जिन्दगी//४४//

उम्रभर    रेंकती     सेंकती     जिन्दगी
फिर  जले  पर  नमक फेंकती जिन्दगी
पात्र भिक्षा का  कर  में  लिए  दौड़कर
आश    में   रास्ता    रोंकती   जिन्दगी//४५//

काटती  है  निशा  टाट   पर   जिन्दगी
दीखती  मौत  के  घाट   पर   जिन्दगी
धन  के  भण्डार  पर कुण्डली मारकर
बैठती  ठाट  से   खाट   पर   जिन्दगी//४६//

चल  रही  फिर  रही  घात में  जिन्दगी
अंधेरी     घनी    रात      में    जिन्दगी
दीख  पड़ती   बनाते   हुए  आज   भी
बस  हवाई  महल  बात   में   जिन्दगी//४७//

नेह  में   रच   रही   अल्पना   जिन्दगी
खो रही  किस  तरह  कल्पना जिन्दगी
सुख की अनुभूति  पलभर हुई ही नहीं
जीना  क्या  है  भला, जल्पना जिन्दगी//४८//

फेरा  लेकर  बँधी  सात  पर  जिन्दगी
काट  देती  नमक  भात  पर  जिन्दगी
माझी  मझधार  नाव  से  हो   विमुख
लगता   रखी  हुई  पात  पर  जिन्दगी//४९//

सुगमता  की  मधुर  आश है जिन्दगी
जीव का ही  तो  उपवास  है जिन्दगी
आओ प्रतिबद्ध हों बस खुँशी के लिए
द्वेष  का  नाश अभिलाष  है जिन्दगी//५०//
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बुधवार, 20 सितंबर 2017

कुण्डलिया

माता शक्ति स्वरूप है, जिसके कृत्य महान
सुत की रक्षा  के लिए,  करती  नये  विधान
करती  नये  विधान,  सदा  न्यौछावर  होती
देती    है    सौगात, सीप  से  लाकर  मोती
शीश नवा जय बोल, द्वार पर जो भी आता
सकल  कामना पूर्ण, करे  नित  अम्बे माता//

नवरात्रि की बहुत सारी शुभकामना के साथ जयप्रकाश चतुर्वेदी

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गुरुवार, 31 अगस्त 2017

जागरण गीत

भोर  भई  रवि  की  किरणें  धरती  कर  आय  गईं  शरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा  कन-सा  अब  देर  नहीं  करना//
गान  करैं  चटका  चहुँओर   सुकाल  भई  सब  धावति  हैं
नीड़न  मा बचवा बचिगै  जिन मां  कर  याद  सतावति  हैं
फूलन  की  कलियॉ  निज  कोष  पसारि सुगंध लुटावति हैं
मानव हों अलि हों  सबको  निज  रूपन  मा  भरमावति हैं//
देख  सुकाल  सुमंगल  है   इनको   निज  नैनन  में  भरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा  कन-सा  अब  देर  नहीं  करना//
खेतन और बगीचन  पै  रजनी  निज  ऑसु  बहाय  गई  है
पोछन को रवि की किरणें द्युति साथ  धरातल  झीन नई है
पोशक दोष विनाशक जो अति कोमल-सी अनुभूति भई है
सागर में सुख के उठि के अब चातक मोतिन खोजि लई है//
दॉत  गिनै  मुख  खोलि  हरी  कर  भारत  भूमि नहीं डरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा  कन-सा  अब  देर  नहीं  करना//
खेतन  मा  मजदूर  किसान  सभी  निज काज सँवार रहे हैं
गाय बँधी बछवा बछिया  निज  भोजन  हेतु  जुहार  रहे  हैं
प्राण-अपान-समान-उदान तथा  नित  व्यान  पुकार  रहे  हैं
जीवन  की गति  है जहँ  लौ  सब  ईश्वर  के उपकार रहे हैं//
आय  सुहावन  पावन  काल   इसे  निज  अंकन  में  भरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा  कन-सा  अब  देर  नहीं   करना//
रैन गई चकवा  चकवी  विलगान  रहे  अब  आय  मिले  हैं
ताप मिटा मन कै सगरौ  तन  से  मन से पुनि जाय खिले हैं
बॉध रहे  अनुराग, विराग  सभी  उर  से  विसराय  किले  हैं
साधक  योग करैं  उठि  कै  तप  से निज हेतु बनाय विले है//
प्राण  सजीवनि  वायु  चली  अब  तौ   सगरौ दुख कै हरना
लाल  सवेर  भई  उठ   जा  कन-सा  अब  देर  नहीं  करना//
यह है जल लो मुख धो  करके अभिनंदन सूरज का कर लो
मिटता मन का सब  ताप उसे  तुम भी अपने उर में भर लो
बल-आयु बढ़े यश भी  बढ़ता  नित ज्ञान मिलै उर में धर लो
अपमान मिले सनमान मिले  सुख की अनुभूति करो उर लो//
जाय  पढ़ो  गुरु  से  तुम   पाठ   प्रणाम  करो  उनके  चरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा   कन-सा   अब  देर  नहीं  करना//
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मंगलवार, 29 अगस्त 2017

अवधी गीत

मित्रों एक लोक गीत समर्पित है=>

पिया आये तौ घरवा दुवार अजब महकै लागा।
सुनी कोयल कै मीठी पुकार जिया चहकै लागा॥
अखिया से अखिया मिली उनसे जैसे,
सोचि न पाई बाति करी वनसे कैसे,
मिटा मनवा कै हमरे गुबार,जिया लहकै लागा।
पिया आये""""॥
तोहरी सुरति पिया कब से बसायन,
तोहरे दरश कहैं जिनगी गवायन,
बहि अँखियन से अँसुवन की धार,
पिया बहकै लागा।
पिया आये""""॥
जिनगी सुफल भई तोहरा के पायन,
प्रेम कै गीति आजु मनवा से गायन,
उठै बार-बार मन मा मल्हार,
जिया कहुँकै लागा।
पिया आये""""॥
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सोमवार, 28 अगस्त 2017

        मुक्तक--------
प्रेम  उल्लास  मन  के  सभी ढह  गये
स्वार्थ ही स्वार्थ में सबके सब बह गये
नेह अन्तस  में  दोनों के  पलता  नहीं
आज  सम्बन्ध-सम्बन्ध  नन  रह गये//
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           मुक्तक--__
गुरु बिना तत्व का भान होता नहीं
तत्व से जो विमुख मान होता नहीं
अपने मन की भुनाता भले ही रहे
शोध बिन सत्य का ज्ञान होता नहीं//
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