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बुधवार, 10 सितंबर 2014

मित्रों सादर प्रणाम 
एक गीत युगल किशोर  के चरणों में 
अनुरञ्जित करते युगल रूप 
नटवर तव चरणों में प्रणाम।   
दो भाव मुझे तव द्वार खड़ा 
दो छन्द मुझे तव द्वार पड़ा 
दो  गीत नई कविता मुझको 
दो किरण नई सविता मुझको 
शाश्वत जग के हो आप भूप 
नटवर तव चरणों में प्रणाम। 
तुम सृजन बीज ही नित बोते 
कण-कण में अाभाषित होते 
मुझको दे दो बस काव्य सृजन 
निश्छल दे दो प्रभु अन्तर्मन । 
वर्णित हो नित तेरा स्वरूप 
नटवर तव चरणों में प्रणाम । 
उपकार कर सकूँ अब सबका 
आभाषित हो दुःख सब सबका 
जिसमें जग का सर्वस्व निहित 
जन मानस का कल्याण विहित। 
मिल जाये मन अनुरूप धूप 
नटवर तव चरणों में प्रणाम । 
द्वेष नहीं अब दिखे कहीं 
मन रुके निरन्तर प्रेम वहीं 
अब ज्ञान पुञ्ज बरसावो ना 
फिर नव उपदेश सुनाओ ना । 
सबको दो अपना दिव्या रूप 
नटवर तव चरणों में प्रणाम । 
बस यही आप से अभिलाषा 
पूरन कर दो मन की आशा 
तुम ही तो जग के स्वामी हो 
मेरा स्वरूप निष्कामी हो  । 
दे दो मुझको अपना स्वरूप 
नटवर तव चरणों में प्रणाम ।
http://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2014/09/blog-post_65.html



मित्रों आज चन्द मुक्तक 

माँते आँचल में अपने सुला लीजिए 
फूल\किरपा के मुझमें खिला दीजिए 
तुमसे विनती करूँ सिर झुकाये हुए 
ज्ञान के दीप मुझमें जला दीजिए ॥ १ 
















दिल में रहते सुरक्षित बिये प्रेम के 
मोह लेते हैं मन हासिये प्रेम के 
लाख चाहे बुझने की कोशिश करो 
कभी बुझते नहीं हैं दिये प्रेम के ॥ २ 


http://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2014/09/blog-post_41.html


प्रिय मित्रों एक गीत सादर निवेदित -

सपने  में बारात सजी थी 
दुल्हन जैसी रात सजी थी । 
पलकों में सतरंगी सपने ले 
घूँघट का पट मुख पर दे 
उर अन्तर में आस लगाये 
प्रेम दीप भी साथ जलाये । 
मनमोहक स्वरूप ले करके 
अजब छवि जो पास खड़ी थी 
सपने  में बारात सजी थी 
दुल्हन जैसी रात सजी थी ।
आकिंचन-सी देख रही थी 
नयनों से निज पेख रही थी 
सौन्दर्य शिरोमणि वह भामा 
वय में दिखती थी वह श्यामा । 
तन-मन में आकर्षण लेकर 
गजब रूप की राशि खड़ी थी 
सपने  में बारात सजी थी 
दुल्हन जैसी रात सजी थी ।
मधुर मिलन का क्षण था वह 
निहार रही थी जिसको वह 
इतने में आवाज आ गयी 
उठ जाओ अब सुबह हो गयी । 
अधूरे सपने के कारण ही 
मिलन नहीं वह कर पायी थी 
सपने  में बारात सजी थी 
दुल्हन जैसी रात सजी थी ।
http://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2014/09/blog-post_51.html


मित्रों आज एक नवगीत 
कैसी    सजी     आ     रही 
बालीबुड से चली  आ  रही।  
अनुपम    सुगन्ध    लिए 
वर   आभूषण   से   सजी
दिव्य    सुन्दरता   लेकर 
वह    चली      आ     रही
कैसी    सजी     आ     रही 
बालीबुड से चली  आ  रही।
अनेक     पुष्पों   से   सजी   
मन्द  -  मन्द    मुस्काती 
जैसे   कुछ     गुनगुनाती
तनिक   आवाज  न  रही  
कैसी    सजी     आ     रही 
बालीबुड से चली  आ  रही।
मैं अपलक उसे  देख  रहा 
उसके  तन  व  चाल   को
मगर    वह   कैसी     थी 
मेरी  तरफ  देख  न  रही
कैसी    सजी     आ     रही 
बालीबुड से चली  आ  रही।
वह    कोई    और     नहीं
एक    कार     थी    सजी  
सुन्दर   वर   को   लेकर
मेरी तरफ चली आ रही 
कैसी    सजी     आ     रही 
बालीबुड से चली  आ  रही।   

http://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2014/09/blog-post_78.html



 मित्रों आज एक अकविता पोस्ट कर रहा हूँ 
अरशे पहले होता था व्याह 
बजती थी शहनाइयाँ 
होते थे मंगलचार 
वर वधू को 
पवित्र परिणय बन्धन में 
बाँधने के लिए 
उस रिश्ते में 
नहीं दिखती थी दरारें 
कुछ जमाना बदला 
शहनाइयाँ गूँजी 
अब नहीं गूँजती 
आया अंग्रेजी बाजा 
धीरे धीरे पाश्चात्य संस्कृति 
छा गयी सब पर 
ब्रास बैण्ड की पों पों की आवाज 
जो कर्ण अप्रिय 
ये भी जमाना बदला 
आया डीजे 
ले गया सब को डायरेक्ट जहन्नुम 
टूट गए वे रिश्ते 
जो बनते थे शहनाइयों की धुनों पर 
आज वहुएं जलाई जा रहीं 
प्रेम समाप्त हो गया 
अत्याचार बढ़ता जा रहा 
नये बाद्य यन्त्रों के 
आवाजों जैसे ही । 
http://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2014/09/blog-post_52.html

मम तिमिर मधु यामिनी में प्रिय उषा की माँग भर दो
अंक   सूनी   सी   निशा   की  प्रात  मेरे  जग  भर  दो । 
है निशा अवशेष जितनी लथपथी  प्रिय  हो  खुशी  से 
सम्मिलन  हो  रात्रिचर  का  भाव  उर  में  हों खुशी के । 
चेतना   भरकर   अलौकिक  प्रेम  का  संचार  कर  दो 
मम तिमिर मधु यामिनी में प्रिय उषा की माँग भर दो। 
काल   स्वर्णिम हो मनोहर   प्रस्फुटन   भी   कली   का 
दिव्य    आभा  रूप  की  हो  पान  करते  हों  कली  का । 
मिल सके आनन्द अनुपम तेज की एक किरन  भर दो 
मम तिमिर मधु यामिनी में प्रिय उषा की माँग भर दो। 
प्रस्फुटित   बहुरंग  कलियाँ  रूप  से  परिसर  सजायें 
मन्द चन्द सुगन्ध से ही  अनवरत  मन  को   लुभायेंं । 
भंगिमा तक पहुँच करके  चाह  का  प्रिय  रंग  भर  दो 
मम तिमिर मधु यामिनी में प्रिय उषा की माँग भर दो। 
बोलतीं चिड़ियाँ  मधुर  मधु  ऋतु  वसन्ती  मोहिनीं है 
चंद    तारे    गगन   में    हैं   मंद   पड़ती   चाँदनी    है।  
अरुणिमा  ले  अर्क  अब तो भोर का प्रिय काल कर दो 
मम तिमिर मधु यामिनी में प्रिय उषा की माँग भर दो। 
http://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2014/09/blog-post_82.html


मित्रों  एक  कजरी निवेदित  हूँ _
भउजी    भइया   के   आनय   पठाय   द्या 
                           हमके  माँगय  ल्या  ना । 
सुन  ल्या हमरा सन्देश,ससुरे बहुतै कलेश 
हमका    मइके   कै   सुखवा   देवाय    द्या
                             हमके  माँगय  ल्या  ना ।
भउजी मैके जब आइत, साथे कजरी  गाइत
अपने    बगिया     माँ    झूला   डराय    द्या
                              हमके  माँगय  ल्या  ना ।
ननदी आवा थई मैके,घर मा ताला अपने दैके
मोरी   सखियन    से   भउजी    बताय    द्या 
                              हमके  माँगय  ल्या  ना ।  
भोरहिं भैया के पठावा,तनिकौ देर न लगावा 
भौजी     जियरा   का   मोरे   हरसाय    द्या
                              हमके  माँगय  ल्या  ना । 
http://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2014/09/blog-post_77.html
एक पुराना गीत
प्रेम  के  अश्रु  बिन्दु लेकर,
भीगी   पलकों   के  भीतर,
हम  तो   तुम्हें   ढूढ़ते   हैं ,
हम    तो   तुम्हें  ढूढ़ते   हैं,
चाहते हैं तुम  मिल  जाओ,
मुझसे    दूर    नहीँ   जाओ,
दूर  कहीं   तुम   जाते   हो,
मुझको   बहुत  सताते  हो,
हम   तो   तुम्हें   ढूढ़ते   हैं,
हम   तो   तुम्हें   ढूढ़ते    हैं,
अति अशान्त मन हो जाता,
''प्रकाश'' नहीं है   सो   पाता,
अँधेरा   जीवन    में   आता,
राह    कोई     नहीं     पाता,
हम   तो   तुम्हें   ढूढ़ते    हैं,
हम   तो   तुम्हें    ढूढ़ते   हैं।
http://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2014/09/blog-post_20.html



एक नवगीत  
पिस रही चाहत एैसे 
रोलर से गिट्टी जैसे 
पास टका नहीं किञ्चित 
सभी दगा देते परिचित 
आशा जिधर लगता हूँ 
उधर निराशा पाता हूँ
अपना हाल कहूँ कैसे  
उड़ते से तिनके जैसे 
पिस रही चाहत एैसे 
रोलर से गिट्टी जैसे 
पड़ा अकेला रोता हूँ 
अपने आँशू पीता हूँ 
कैसा जीवन का नाता 
कुछ भी मन को न भाता 
गरीबी झेल रहा एैसे 
जल के बिन मछली जैसे 
पिस रही चाहत एैसे 
रोलर से गिट्टी जैसे 
परिश्रम दिनभर करता हूँ 
रोटी खातिर मरता हूँ 
परिकर की किस्मत फूटी 
अपनी छानी भी टूटी 
जीवन अब बीते कैसे 
लगता है दोजख जैसे 
पिस रही चाहत एैसे 
रोलर से गिट्टी जैसे 
बिलख रहे बच्चे सारे 
फूटी किस्मत के  मारे
नंगे बदन दौड़ते हैं 
हमसे खूब झगड़ते हैं 
देदो अब मुझको पैसे 
भूखे है बरसों जैसे 
पिस रही चाहत एैसे 
रोलर से गिट्टी जैसे 
दुख में काट रहा जीवन 
फिर भी आशा बादी मन 
कभी खुशी भी आयेगी 
हमको खूब हंसाएगी 
होंगे आनन्दित कैसे 
सागर की लहरों जैसे 
पिस रही चाहत एैसे 
रोलर से गिट्टी जैसे  
http://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2014/09/blog-post_62.html


अन्तस से जो मीत बन गये 

उनके ही अब गीत बन गये
लकुटी सा देकर आलम्बन 
सदा सर्वदा कर अभिनन्दन 
आज प्रीत के रीत बन गए 
उनके  ………………। 
अपनापन दिखला नजरों में 
तन के मन के हर मजरों में 
प्रेमी पथ के शीत बन गये 
उनके   ………………। 
नृत्य करे मन मीत देख 
जिनकी अन्तस में अमिट रेख 
आपस में जो प्रीत बन गये 
उनके ...................... .... । 
कॉँटों के पथ को अपनाया 
सारा सुख वैभव विसराया 
जीवन के संगीत बन गये 
उनके ………………… । 
छल प्रपंच से दूर रहे जो 
दुनिया से मजबूर  वो 
अपनों से भी तीत  गये 
उनके …………………… । 

http://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2014/09/blog-post_10.html




एक नवगीत  
पिस रही चाहत एैसे 
रोलर से गिट्टी जैसे 
पास टका नहीं किञ्चित 
सभी दगा देते परिचित 
आशा जिधर लगता हूँ 
उधर निराशा पाता हूँ
अपना हाल कहूँ कैसे  
उड़ते से तिनके जैसे 
पिस रही चाहत एैसे 
रोलर से गिट्टी जैसे 
पड़ा अकेला रोता हूँ 
अपने आँशू पीता हूँ 
कैसा जीवन का नाता 
कुछ भी मन को न भाता 
गरीबी झेल रहा एैसे 
जल के बिन मछली जैसे 
पिस रही चाहत एैसे 
रोलर से गिट्टी जैसे 
परिश्रम दिनभर करता हूँ 
रोटी खातिर मरता हूँ 
परिकर की किस्मत फूटी 
अपनी छानी भी टूटी 
जीवन अब बीते कैसे 
लगता है दोजख जैसे 
पिस रही चाहत एैसे 
रोलर से गिट्टी जैसे 
बिलख रहे बच्चे सारे 
फूटी किस्मत के  मारे
नंगे बदन दौड़ते हैं 
हमसे खूब झगड़ते हैं 
देदो अब मुझको पैसे 
भूखे है बरसों जैसे 
पिस रही चाहत एैसे 
रोलर से गिट्टी जैसे 
दुख में काट रहा जीवन 
फिर भी आशा बादी मन 
कभी खुशी भी आयेगी 
हमको खूब हंसाएगी 
होंगे आनन्दित कैसे 
सागर की लहरों जैसे 
पिस रही चाहत एैसे 
रोलर से गिट्टी जैसे  
http://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2014/09/blog-post_10.html




       
अवधी-गीत
माईकै महिमा जगत
मां निराली ममता कै बरसै फुहार हो ।
जेकरिनि छहिंयाँ मां दुनिया हमारी मिलै
नित अँचरा मां प्यार हो।।
बुकवा औ तेलवा सनेहिया लगावैं
कजरा लगावैं रतनार हो
लागै न टोनवाँ ललन के हमारे ढि़ठवन
बनावै लिलार हो
अँचरा ओढ़ाय माई दुधवा पियावैं करैं निज
अँचरा बयार हो
माई कै़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़।।
लोरिया सुनावैं माई गोंदिया झुलावैं करैं
निज अँचरा बयार हो
निदिया न जबले नयनवाँ मां आवै
थपकी लगावैं सत् बार हो।
गीले मां सोइ माई -झूरे सोवावैं खुश  होंय
ललना निहार हो
माई कै़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़।।
आवै जौ छिंकिया शतंजीव बोलैं सुख
नाहीं उर मां समाय हो
देखि-देखि ललना मगन होंय माई कहैं
नित देवता मनाय हो ।
हमरिउ उमरि लैके जिया मोर
ललना मिलै सुख तुहुँका हमार हो
माई कै़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़।।
अंगुरी पकरि माई चलना सिखावैं और
सिखावैं व्यौहार हो
माई कै करजा उरिन नाहीं बाटै बाटै
बड़ा उपकार हो ।
सेवा भगति कैके
जिनगी सँवारा कही हम सबसे पुकार हो
माईकै़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़।।
रचनाकार-जयप्रकाश  चतुर्वेदी
ग्राम-चैबेपुर,पो0-खपराडीह,जि0-
फैजाबाद,उ0प्र0,पिन0-224205,
मो0-09936955846,9415206296

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सोमवार, 8 सितंबर 2014

मित्रो एक नवगीत सादर निवेदित__

सभी पुरानी परिपाटी को भूल रहे हैं 
रिश्ते फांसी के फन्दे में झूल रहे हैं । 
दूर हो रही मानव मन से मानवता
अन्तस्तल में आकर ठहरी दानवता 
अपनों से ही राहो में उग शूल रहे हैं
रिश्ते ......
मिलने पर बातों में अपनापन है दिखता
नहीं किसी का भली बात पर मन है रुकता
अन्दर ही अन्दर में बिष फूल रहे हैं
रिश्ते .......
कही अनकही अनजानी सी बातें लेकर
प्रेम त्याग की बातों को ताखो में देकर
अपनाने को कोई नहीं वसूल रहे हैं
रिश्ते........
साथी बनकर कोई देता नहीं इशारा
उठ जाती है जीवन डोली बिना सहारा
हमराही भी फर्ज आपने भूल रहे हैं
रिश्ते .........।।
जयप्रकाश चतुर्वेदी
https://m.facebook.com/profile.php?id=693459924051866&fref=none http://shakuntlamahakavya.blogspot.in/?m=1

     वाणी वन्दना                          
                   
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